Sunday, March 9, 2014



एक प्रशासनिक अनुभव ...
डॉ पी के दीक्षित PCS
शहर का नाम ...रहने दो भाई
में प्रवर्तन विभाग बिक्रीकर में असिस्टंट कमिश्नर था .साल कोई भी मान लो .मेरे पास छह प्रशिक्षार्थी यानि ट्रेनी आये थे .में उन्हें कुछ सिखाने के उद्द्देश्य से एक फैक्ट्री में ले कर गया .मालिक ने बड़े प्यार आदर से बैठाया ,कॉफ़ी,आदि मगाई पर मेने देखा कि बहार हट्टे कट्टे नो दस मज़दूर लाठिया लिए इकट्ठे हो गए थे .असल में हम सात अधिकारियो को देख कर वो समझे कि सिखाने का बहाना हे ,ये लोग रेड डालने आये हें .में समझ गया कि अब धुनाई होने की प्रबल सम्भावना हे ...बचना तो होगा ही,वरना इन मुस्टंडों से पिटने में मज़ा नहीं आएगा .मेने कूटनीति से काम लिया.मेने नए ऑफिसर्स से कहा की देखो हैम लीग तो इनसे मिलने आये हें ..ये भले व्यापारी हें वरना कुछ शातिर व्यापारी मरने पीटने पर अमादा हो जाते हें अब जैसे ये मज़दूर बहार खड़े हें,ये तो सिर्फ देख रहे हें की इतने अफसर क्यों आये हें?ये तो भले लोग हें वरना ये पीटने के लिए भी खड़े हो सकते थे.ये तो हमारे खास परिचित व्यापारी हें और हमारा कितना स्वागत कर रहे हें वरना कॉफ़ी पिलाते हुए भी हमला भी कर सकते थे,पर ये तो....
मालिक हमारे सामने हिनहिनाने लगा...अरे ना साब हम काय को मार पीट करेंगे आप तो भले अफसर ठहरे...उसने इशारा किया ,मज़दूर चले गए.इस प्रकार दो भले महापुरुषों का सम्मलेन समाप्त हुआ !!स्थिति तनावपूर्ण किन्तु नियंत्रण में रही ....